यह सवाल सभी से है कि आखिर आतंकवाद के विरोध के लिए बैनर की तलाश क्यों ? आखिर जो भी आतंकवाद का विरोधी है उसे सिर्फ आतंकवाद का विरोध करना है या फिर इस बात का चयन कि किस आतंकवाद का हमें विरोध करना है और किसका नही ?


आपको चौकने की आवश्कता नहीं है बल्कि यह अत्यधिक गंभीर विषय है क्योंकि अभी तक यही देखने में आया है कि आतंकवाद का विरोध भी सिलेक्टिव होकर किया जा रहा है जैसे अभी जिस प्रकार यूक्रेन और रूस की जंग चल रही है उसे बहुत सारी जगहों पर और बहुत लोगों द्वारा आतंकवाद करार दिया जा रहा है जबकि इन्ही लोगों ने अभी इजराइल के  फिलिस्तीन पर हमले को आतंकवाद नहीं माना था वहीं सीरिया पर बमबारी को भी आतंक के सफाए के लिए जंग माना था।

सीरिया विध्वंस का एक मंजर

खैर हम बात अपने भारत में बढ़ते आतंकवाद पर करते हैं जिसे वैचारिक आतंकवाद ही कहा जाना चाहिए मैं इसे भगवा या हिंदू आतंकवाद नहीं कह सकता क्योंकि किसी रंग या किसी मजहब का कोई आतंकवाद होता ही नहीं है आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद होता है जो सिर्फ तबाही लाता है वह किसी भी रूप को धारण किए हो उसका विरोध ही बचाव का एकमात्र विकल्प है।

फिलिस्तीनियों पर इजराइल का मस्जिद में हमला

अभी जिस तरह दिल्ली जहांगीरपुरी में शोभा यात्रा के दौरान सांप्रदायिक विवाद हुआ उसके बाद जिस तरह बुलडोजर की कार्यवाही न्यायालय के आदेश को ताख पर रख कर की गई वैसे ही रामनवमी जुलूस के दौरान करौली राजस्थान और खरगौन मध्य प्रदेश में  वारदात हुई हर तरफ वैचारिक आतंकवाद की गिरफ्त में आए बेरोजगार नवजवानों की टोली आतंक का ढोल बजाती घूम रही है दरअसल यह वैचारिक आतंक की चपेट में आए वह युवा है जोकि मानसिक अवसाद में ग्रस्त हो चुके हैं बेरोजगारी के चलते अंदर से टूटे हुए कमजोर लोगों की टोली धर्म का नाम मात्र लेकर दूसरों को नुकसान पहुंचाने को तुली हुई है।

बात यहीं समाप्त नहीं होती यह टोली और अधिक खतरनाक तब होती है जब इसे सत्ता का आश्रय मिलता है और चुनावी नफा नुकसान के चक्कर में इसे समर्थन दिया जाता है और यह आतंकवाद राज्य प्रायोजित आतंकवाद का घिनौना रूप ले लेता है जो पूरे देश में इस समय दिखाई दे रहा है अब हर वह व्यक्ति खतरे में है जोकि इस विचारधारा को समर्थन नहीं करते यानी अब हिंदू और मुसलमान या सिख और ईसाई नही बल्कि भारत खतरे में है इस वैचारिक आतंकवाद से।

जब देश के लिए यह वैचारिक आतंकवाद खतरा है तो इसके खिलाफ लामबंद होने के लिए अलग अलग बैनर अलग प्लेटफार्म क्यों ? जब खतरा सबके लिए समान है तो इसका सामना एकजुटता से ही संभव है कल शुक्रवार है और कई जगहों पर इस वैचारिक और राज्य प्रायोजित आतंकवाद जिसे बुलडोजरवाद भी कहा जा सकता है के खिलाफ  सिविल सोसाइटी ने विरोध प्रदर्शन बुलाए हैं जिसकी कई राज्यों में प्रशासन ने अनुमति भी नही दी है लेकिन ऐलान हो चुका है ऐसे में एक नए टकराव के रूप में इसे भी देखा जा सकता है।

कोलकाता में होने वाले एक विरोध प्रदर्शन का पोस्टर

जबकि रमजान की 21वी रात भी कल है और कल ही के दिन मुसलमानों के खलीफा और पैगंबर के दामाद हजरत अली की शहादत हुई थी इसे इस्लामिक हिस्ट्री में मस्जिद के अंदर मंसूबेबंदी कर एक वैचारिक आतंकवादी द्वारा नमाज के दौरान पहली हत्या माना जाता है यानी राज्य प्रमुख की मस्जिद के अंदर आतंकवादी द्वारा हत्या और शिया मुस्लिम इस दिवस को आतंक के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन के रूप में धार्मिक तौर पर मनाते हैं ।

कोलकाता की सड़क पर नौशीन बाबा खान के नेतृत्व में होता विरोध प्रदर्शन एक दृश्य

अब आपका सवाल यह हो सकता है कि यहां 21वी रात और हजरत अली की शहादत का जिक्र किस लिए तो सुनिए 21 रमजान को जब आतंकवाद विरोध के लिए एक समुदाय मनाता है तो फिर उसी विरोध प्रदर्शन में सब एकजुट क्यों नही हो सकते ?

लखनऊ में 21 रमजान को निकलने वाले ताबूत का एक दृश्य

क्योंकि जब विषय एक है और ध्येय भी समान है तो बैनर और पलटेफर्म अलग क्यों ?क्या इससे बेहतर कोई तरीका अपने विरोध का हो सकता है ? क्या अपनी एकजुटता दिखाने का इससे बेहतर कोई विकल्प है ? यदि आप समान कार्य के लिए भी सिर्फ धर्म ,मसलक या फिरके की बुनियाद पर एकजुट नहीं हो सकते तो फिर आपका विरोध प्रदर्शन महज एक दिखावे से अधिक क्या है?कम से कम मुस्लिम समाज तो अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर सकता है क्योंकि अली में तो सबकी आस्था है यदि नहीं तो फिर आखिर वही बात

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