नंगा भारत बनाम शर्मिंदा भारत

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दो बेटियों को दरिंदों ने उस देश में बर्बरता से नोचा जिस देश में द्रोपदी की चीर बचाने स्वयं श्री कृष्ण आये थे लेकिन कृष्ण जन्मभूमि के नाम पर सियासी रोटी सेंकने की कोशिश करने वाले निर्लज्ज दूर दूर तक इन बेटियों की मदद के लिए नहीं आए,शर्म का ऐसा सैलाब आया कि हर गैरत वाला इंसान उसमें डूब गया सिवा बेगैरत लोगों के जो घटना की लीपा पोती के लिए उतर पड़े।

एक मंत्री तो एक सियासी पार्टी के चुनावी नारे को मुद्दा बनाकर पूछने बैठ गए आप राजस्थान क्यों नहीं गई ,बंगाल क्यों नहीं गई या बिहार क्यों नहीं गई क्योंकि आप कहती हैं लड़की हूं लड़ सकती हूं,किसी ने उनसे यह सवाल नहीं किया या यूं कहिए किसी ने हिम्मत नहीं की उनसे यह पूछने की भला आप तो ठाकुर लिखते हैं नाम के आगे आप क्यों नही मणिपुर की बेटियों को बचाने पहुंचे,
खैर यह सब बाते वाद विवाद की है हमें तो अपने प्रधानमंत्री जी के असीम दुख की बात करनी है।

हर तरफ शर्म के नारे गूंज रहे हैं धर्म के रक्षक हों या सियासत के बाहुबली सबके सब एक सुर में शर्म की बात कर रहे हैं ,लेकिन जिसे देखिए प्रधानमंत्री को निशाना बना रहा है सब कह रहे हैं कि आपने आंखें क्यों बंद रखीं ? अब इन सवाल पूछने वालों से पूछिए कि आखिर ऐसे घिनौने दृश्यों पर आंख न बंद की जाए तो और क्या किया जाए आप लोगों में कुछ भी लाज शर्म नहीं बाकी है क्या जो ऐसे दृश्य पर आंखें खोलने की बात कर रहे हैं।
ज़रा उनकी भावुकता को समझने की कोशिश तो कीजिए किस तरह उन्होंने पूरे दो महीने खुद को संयमित रखा,ऐसी घटना के बावजूद फ्रांस और यूएई का डंका बजने वाला दौरा किया मजाल है कोई उनके दुख को उनकी पीड़ा को भांप भी पाया हो,पूरे देश को ऐसे प्रधानमंत्री पर गर्व करना चाहिए जो अपने मन की पीड़ा को इस प्रकार दबा कर देश के लिए विदेश घूम रहा हो दर दर मारा मारा फिर रहा हो सिर्फ देश का डंका बज जाए इस फिक्र में ,अब कोई इतना त्याग कर रहा हो तो उसकी नियत पर शक तो निर्लज्जता ही कहलायेगी क्यों ?

अब विपक्ष के पास कोई काम तो है नहीं सिर्फ नेहरू की गलतियों को मौजूदा प्रधानमंत्री के सर मढ़ना अगर नेहरू के दौर में ही पूर्वोत्तर राज्यों का मामला सही कर लिया गया होता तो क्या ऐसी घटना होती ?खैर घटना है घट गई ,मणिपुर में कुछ लोग मर गए कुछ महिलाओं के साथ रेप हो गया लेकिन क्या यह देश में पहली बार हुआ है ?

पिछले 70 सालों में हजारों बार ऐसा हुआ तब तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई अब क्यों ? दरअसल यह लोग देश का विकास नहीं देखना चाहते इस लिए प्रधानमंत्री जी पर आरोप लगाते रहते हैं ,खुद कुछ किया नहीं जो करना चाहता है उसके पीछे पड़े हैं क्यों ?

देश में इतनी कंपनिया थी उनका सही खरीदार तक नहीं ढूंढ पाई पुरानी सरकार और प्रधानमंत्री जी ने एक ही ऐसा हीरा खोजा जिसने देश की सारी संपत्ति को खरीदने के लिए हामी भर दी यूंही कोई यशशस्वी नहीं बन जाता इसके लिए 18-18 घंटे काम करना पड़ता है हैं न?
एक घटना पर इतना शोर क्यों ?सवाल पूछा जाना चाहिए उन लोगों से जिन्हें बस राजनीत करनी होती है किसी भी मसले पर अब इतना बड़ा देश है कुछ घटनाएं तो होंगी ही।वैसे भी कौन सा भारत की हर बेटी के पास तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़ा मौजूद है तब तो कोई राजनेता नहीं चिल्लाता,सवाल तो यह भी है कि एक बड़ी संख्या इस देश में ऐसी भी है जो दो वक्त की रोटी के लिए कपड़े उतारने पर मजबूर है तब सब खामोश है।हालांकि यह जब है जब केंद्रीय महिला एवम बाल विकास मंत्री भी एक महिला हैं और ज्ञानी भी बहुत हैं भावुकता में उनका कोई सानी नहीं ।
अब आखिर प्रधानमंत्री जी ने देश को आगे बढ़ाने के बाद समय मिलते ही अपना दुख सार्वजनिक किया लोगों को बताया कि उन्हें इस घटना पर कितना असीम दुख है और क्या चाहते हैं उनसे अब सीना चीर कर तो दिखा नहीं सकते वह बजरंग बली के भक्त खुद को कहते हैं कोई खुद बजरंगबली तो नहीं हैं ,और फिर देश के प्रधानमंत्री जी पर इतना भरोसा तो कीजिए ही कि जो वह कहें उसे आंख बंद कर मान लीजिए क्योंकि वह झूठ नही बोलते ! प्रधानमंत्री जी ने दुख से लड़ते हुए पूरे देश की तरफ नज़र दौड़ाई और अपने सिपाहसलारों को कहा देखो देश में और कहीं नेहरू की गलती से किसी बेटी के साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ तो क्या था फौरन बंगाल ,राजस्थान और बिहार से खबर आई कि यहां भी कुछ हुआ है तब जाकर प्रधानमंत्री जी को गुस्सा आया और उन्होंने पूरी सेना उतारी कि नेहरू की गलती को उजागर कर दिया जाए।

वैसे मणिपुर को लेकर इतना हो हल्ला क्यों अब कोई घटना हो गई तो इसके लिए क्या सरकार बर्खास्त कर दी जाये? कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं सरकार बनाने के लिए कितना एक्स्ट्रा काम करना पड़ता है प्रचार करना पड़ता है हॉर्स ट्रेडिंग करनी होती है तब जाकर सरकार बनती है ऐसे में एक घटना पर सरकार को बर्खास्त करना कहां का समझदारी वाला फैसला है?प्रधानमंत्री जी दुखी हुए हैं उनका दिल रोया है इतने से आपके कलेजे में ठंडक नहीं पड़ी,देश की जिम्मेदारियों के बीच इतना दुख सहन करना आसान बात है,वह तो कहिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से इस मुद्दे पर बोल दिया वरना मजाल है जो प्रधानमंत्री जी अपना दुख किसी के बताते भी अकेले अकेले ही इस दुख को सहते रहते चेहरे पर मुस्कान सजा कर लोगों को लगता कि कुछ नहीं हुआ है आप बताइए सही कह रहा हूं न मैं?
भला सोचिए कितनी महानता है उनकी कि वह अपना निजी दुख देश पर ज़ाहिर कर लोगों को दुखी नहीं करना चाहते उनका मानना है लोग हल्की फुल्की महंगाई से थोड़ा दुखी हैं अब ऐसे में वह अपना दुख बता देंगे तो लोग कैसे इसे बर्दाश्त करेंगे? यह विपक्ष में बैठे लोग क्या जाने उन्होंने कभी जनता के दुख सुख के परवाह की हो तो पता हो , छोटी छोटी घटनाओं पर सरकार बर्खास्त कर किनारे हो जाने वाले लोग समस्याओं से लड़ना क्या जाने यह तो प्रधानमंत्री जी की दूरदृष्टि है कि जो वह ऐसा कोई फैसला नहीं लेना चाहते,आखिर देश पर चुनाव का अलग से बोझ कोई देशभक्त कैसे डाल सकता है?

कुछ लोग दर्द गाने बैठे हैं बिना यह जानते हुए कि यह घटना क्यों हुई पढ़ना लिखना कुछ है नहीं बस देश को गुमराह करने बैठ गए हैं व्हाट्सएप विश्विद्यालय पर पूरा मणिपुर पर कोर्स आ गया है जिसमें पूरी घटना को सही से समझा दिया गया है कि दरअसल जिस समुदाय की वह महिला थीं कुकी जनजाति की वह मंगोल हैं और अफीम की खेती करते हैं साथ ही अधिकतर ईसाई हैं जबकि मैतेई समुदाय हिंदू है राज्य में बहुसंख्यक है लेकिन जमीन और संसाधन पर ईसाई कुकी समाज का कब्ज़ा है लिहाज़ा विदेशी लोगों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार के विरोध में यह प्रतिक्रिया है जिसे इतना प्रचारित यूरोपीय देशों की शय पर किया जा रहा है आप तो अब भीड़ के साथ खुद को जोड़ने लगे होंगे?

महिला जिसका बलात्कार हुआ उसका धर्म और जाति ज़रूरी विषय है क्योंकि चुनाव भी आ रहे हैं और संदेश भी दिया जाना है लिहाज़ा शर्म किस स्तर की आनी है इस पर विचार जरूरी है वैसे यह आज़ादी का अमृत काल है जिसमें भारत की बेटियों को कपड़ा नसीब नहीं हो सका क्योंकि वैचारिक आतंकियों ने उनके शरीर को नोच डाला ,सरकार हर घर तिरंगा अभियान चलाती रही काश कोई ध्वज ऐसा भी होता जो उनका बदन ढक देता और लाज बचा लेता काश ऐसा संभव होता लेकिन आपको दुखी होने की जरूरत नहीं है प्रधानमंत्री जी बहुत दुखी हैं और उनके दुख पर निसार हो जाना चाहिए क्यों ?

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