
अचानक से देश की मीडिया का जो पुरषार्थ जागा है उसने जहाँ लोगों को एक सुखद एहसास कराया है वहीं कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि अदानी अंबानी घराने की बंधक मीडिया ने यह सुर कैसे बदले , रजत शर्मा सरीखे टीवी संपादक और एंकर ज्ञानेश पर ज्ञान दे रहे हैं और उन्हें कटघरे में खड़ा कर रहे हैं लगभग देश के सभी मीडिया हाउस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों पर सवाल करते दिख रहे हैं विपक्ष तो जैसा निकम्मापन करता आया है वैसे ही रियेक्ट करता दिखा है कोई मामला आया तो बयानबाज़ी करने का काम इनके ज़िम्मे है बाक़ी सड़कों पर आंदोलन से दूरी ।

खैर आइए आते हैं मुख्य विषय पर अब आपको इतना तो पता ही है कि इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की एक पत्रकार ने अचानक केंद्रीय चुनाव आयोग की एक विस्फोटक ख़बर ब्रेक की जिसमे उसने तथ्यों के साथ कहा कि तीनो चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति है बाक़ी पूरी ख़बर विस्तार से आप जानते हैं इसलिए इसपर शब्दों को बर्बाद कर क्या फ़ायदा हम बात करते हैं असली खेल पर जिस ओर देखा जाना चाहिये ।
आख़िर ऐसा क्या है कि सरकार भी चुनाव आयोग के बचाव में वैसे नहीं खड़ी है जैसे पहले खड़ी होती रही है सवाल चुनाव आयोग पर हो तो सरकार जवाब देती थी लेकिन इस बार इसे चुनाव आयोग का मामला बताया जा रहा है सिर्फ इतना ही नहीं आनन फ़ानन में नये केजरीवाल जो अभी जंतर मंतर धरना प्रदर्शन में एक्सपोज़ हो चुके उन्होंने ऐलान कर दिया कि 48 घंटे के भीतर ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा दे वरना देशव्यापी आंदोलन होगा यह सब कुछ यूँही नहीं हुआ जरा सोचिए धर्मेंद्र प्रधान का जाना पहले से तय था और लिखी लिखाई पटकथा के अनुसार सब चला वह तो राहुल गांधी ने अचानक अपनी चाल से पूरी कहानी में ट्विस्ट ला दिया और बचा खुचा खेल कम्युनिस्ट स्टूडेंट विंग के लोगों ने कर दिया लिहाजा दीपके को वापिस प्रासंगिक बनाने का बेहतरीन मौका हो सकता है ।

विपक्ष वही ढाक के तीन पात वाली कहावत पर चलता दिख रहा बयानबाज़ियो से आगे जाने की इच्छाशक्ति उसमें नहीं दिख रही है अगर लड़ती दिख रही है तो सिर्फ़ अकेली कांग्रेस, लेकिन सरकार इस बात को बखूबी जानती है कि अब विपक्ष में कांग्रेस के सिवा जितने राजनैतिक दल हैं उनके पास खोने को कुछ नहीं बचा है तो वह राहुल की अगुवाई में चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल हो सकते है।

ज़मीन पर जनाक्रोश भी है और अगर SIR में जिन लोगों के नाम काटे गये वह इस आंदोलन में शामिल हो जाते हैं तो सरकार इसे संभाल पाने में असमर्थ होगी लिहाज़ा डैमेज कंट्रोल बड़ी चालाकी से करना होगा लिहाज़ा ज्ञानेश को कुर्बानी के लिए पेश कर दिया गया है !

अगर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफ़ा होता है तो लोगों का गुस्सा कम होगा वहीं बाक़ी दो चुनाव आयुक्त जनता की नज़र में साफ़ छवि के साबित होंगे हालांकि उनका चयन भी बीजेपी सरकार द्वारा ही किया गया है उन्हीं में से कोई एक मुख्य चुनाव आयुक्त बनेगा और बड़ी सफ़ाई से 2029 का चुनाव निपटा दिया जायेगा ।
इधर कांग्रेस का अधिकतर राज्यों में बीजेपी से वन टू वन वाला सपना भी दीपके की इंट्री से स्वाहा होगा यानी एक प्यादे की बलि से राजा और वज़ीर भी बच जाएँगे साथ ही सामने खड़ी भारत की जानता को सीधे मात होगी ।

मीडिया के बदले सुर ,सरकार की खामोशी और दीपके का एलान सब एक साथ देखा जाना ज़रूरी है तब पिक्चर साफ़ दिख सकती ।
यूनुस मोहानी







