
बिहार और मध्य प्रदेश में बीजेपी का शासन होते हुए उपचुनावों में उसकी हार से अलग अलग अटकलें लगायी जा रही हैं ,जहाँ बिहार में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफ़े से ख़ाली हुई बांकीपुर सीट पर जन स्वराज के उम्मीदवार पीके ने विजय पताका फहराई वहीं दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट कर भाजपा ने जो खेल खेला उससे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दतिया का प्रतिनिधित्व मिला ।

उपचुनावों के नतीजे को अलग अलग राजनैतिक विशेषज्ञ बीजेपी की उल्टी गिनती या उसके स्वर्ण मतदाताओं की नाराज़गी का परिणाम कहीं Gen Z का फ़ैसला आदि आदि के रूप में देखा जा रहा है हालाँकि राजनीत को पूरी तरह समझने का भ्रम किसी को नहीं पालना चाहिए क्योंकि एक ही चाल के कई निशाने होते हैं और ज़रूरी नहीं कि किसी को वह सारे पहलू साफ़ दिखे ।

बात शुरू करते हैं बिहार की बांकीपुर विधानसभा के परिणामों से यहाँ बीजेपी आरजेडी और जन स्वराज मैदान में थे और मुख्य मुकाबला भाजपा तथा जनस्वराज के मध्य सिमट गया राष्ट्रीय जनता दल तीसरे पायेदान पर पहुंचा इस परिणाम को सिर्फ़ प्रशांत किशोर की जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता इसे तेजस्वी यादव की बड़ी हार के रूप में देखना ज़्यादा मायने रखता है ।

पूरे देश का विपक्ष इन नतीजों पर ख़ुशी मना रहा है और बयान पर बयान आ रहे हैं इसे बीजेपी की घरवापसी के तौर पर देखा जा रहा है जबकि ज़रूरी नहीं कि यह सच हो क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव से ज़्यादा नाराज़गी तो अभी मतदाताओं में नहीं है वहीं मध्य प्रदेश में भी अलग तरह का नतीजा आ चुका है तो उस समय ऐसी प्रचंड जीत बीजेपी की हुई अचानक ऐसा क्या बदल गया ।
बिहार में जेडीयू लगभग समाप्ति की तरफ़ जा चुकी है और आरजेडी भी लालू यादव के जीवन काल में ही हाशिए पर पहुँच गई है बाक़ी छोटे क्षेत्रीय दल बीजेपी की गोद में हैं ऐसे में यदि बिहार का मुस्लिम मतदाता और दलित वापिस कांग्रेस का रुख़ करता है तो बिहार की तस्वीर बदल सकती है क्योंकि बीजेपी
से स्वर्ण मतदाताओं की नाराज़गी जगजाहिर है और उन्हें कांग्रेस से आरजेडी जैसा कोई परहेज भी नहीं है अगर बिना किसी मज़बूत विपक्ष के कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने होते हैं तो कांग्रेस बाज़ी मार सकती है और 2029 में बीजेपी के लिए घातक हो सकता है ।यह कोई संभावनाओं पर आधारित आकलन नहीं है बल्कि ज़मीन का सच है आरजेडी और जेडीयू के सिमटने से सीधे बीजेपी को खतरा हुआ है और बीजेपी आरजेडी को जीवनदान भी नहीं दे सकती थी क्योंकि वह सीधे तौर पर कांग्रेस के साथ है। जेडीयू नेतृत्व विहीन हो चुकी है और उसके नेता नीतीश कुमार राज्यसभा में रिटायरमेंट के बाद मन बहला रहे हैं ऐसे में कांग्रेस को रोकने के लिए ऐसा कोई फ्रंट चाहिए जो स्वर्ण मतदाताओं को अपने साथ लेकर दलित और मुसलमान वोटो में सेंध लगा सके जिससे सीधे कांग्रेस का वोट प्रतिशत न बढ़े और बीजेपी उसे सीधी बढ़त लेने से रोकने में कामयाब हो जाए ।

इस काम के लिए जनस्वराज से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता था जहाँ प्रशांत किशोर की अपनी रणनीतिकार वाली छवि के साथ उनका ब्राह्मण होना तो उनकी योग्यता बताता ही है वहीं बिहार में कमजोर सही मगर संगठन भी मौजूद ही है ऐसे में उन्हें विधानसभा में लाकर उन्हें मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित करना कठिन नहीं है ।
प्रशांत की बीजेपी से कोई लड़ाई नहीं यह बात जगजाहिर है लिहाजा यह सही पैतरा है जिससे भाजपा को फ़ायदा होना तय है ।

बीजेपी ने जहाँ बिहार में अपने लिए विपक्ष गढ़ा है वहीं अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के पर भी थोड़े कतरे हैं क्योंकि उनकी परंपरागत सीट पर बीजेपी बुरी तरह पराजित हुई यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष जी अपनी विधानसभा सीट पर भी पार्टी को जीत नहीं दिला सके उससे उन्हें अपना क़द माप लेना चाहिए और नड्डा जी की शैली में ही काम करना चाहिये ऐसा संदेश भी गया है ।

वहीं मध्य प्रदेश में साफ़ तौर पर मोहन यादव के लिए परेशानी खड़ी हो गई है दतिया उपचुनाव के परिणाम बिल्कुल चौकाने वाले नहीं है और न ही मध्य प्रदेश में कोई बदलाव आ गया है ,लेकिन केंद्रीय नेतृत्व द्वारा मोहन यादव की चूड़ी टाइट कर दी गई हैं और संदेश दे दिया गया है कि कभी भी नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है ।

इस तरह बीजेपी अपने लिए ख़ुद ही विपक्ष गढ़ रही है जैसे जंतरमंतर पर हुआ अभिजीत दीपके का आंदोलन साफ़ तौर पर प्रायोजित दिखा हालांकि बाद में इसकी कमान उनके हाथों से निकल गई और यह आंदोलन स्वतंत्र छात्रों का आंदोलन बन गया और बीजेपी राहुल के खेल में फँस गई अब देखना यह है कि कब दीपके अपनी नई पार्टी का ऐलान करते हैं और चुनावी राजनीत में उतर का सिस्टम के अंदर की गंदगी साफ़ मारने का ऐलान करते हैं ?
अगर दीपके चुनावी राजनीत में आते हैं तो उनके पास गुजरात विधानसभा चुनाव सबसे उपयुक्त होगा और वहीं से वह अपनी पार्टी की यात्रा शुरू कर सकते हैं ।

पिछली बार गुजरात आम आदमी ने बचा लिया था इस बार वह ख़ुद पाने अस्तित्व के संकट स्व जूझ रही है ऐसे में गुजरात में भी बिहार जैसी स्थिति आ गई है विपक्ष में कांग्रेस अकेली है और यह बीजेपी के लिए डराने वाली बात है इसलिए एक नया विपक्ष वहां की ज़रूरत है जिसे दीपके पूरा कर सकते हैं ।
यह एक स्वतंत्र विश्लेषण मात्र है उपचुनाव के परिणामों का जोकि माज़ी की घटनाओं की कसौटी पर परखा गया है बाक़ी सही समय आने पर जवाब मिलना है ।







